Saturday, December 8, 2018

जिसका काम, उसी को साजे

जिसका काम, उसी को साजे …

गर्मी की कड़कती दोपहरी थी। एक सेठ जी का बंगला बन रहा था। उसी बंगले का Furniture बनाने के के लिए कुछ बढ़ई छीनी – हथौड़ी के माध्‍यम से लकडिया चीर रहे थे।
दोपहर के भोजन का समय हो गया था, इसलिए कुछ बढ़ई छीनी को उसी लकड़ी में फंसाकर भोजन करने चले गए, जिसे काट रहे थे।
थोड़ी देर बाद बंदरों का एक झुण्‍ड खेलते-कूदते उसी जगह पहुँच गया जहां बढ़ई लकडिया चीर रहे थे।
उन बंदरों में एक बंदर बहुत ही शरारती था। जब उसने एक लकड़ी के बीच फंसी छीनी को देखा, तो उसे बड़ा आश्‍चर्य हुआ।
वह शरारती बंदर उस छीनी को उस लकड़ी से निकालने के लिए लकड़ी पर चढ़ कर बैठ गया और वह उस छीनी को लकड़ी से बाहर निकालने के लिए उसे खींचने लगा। लकड़ी बहुत ज्‍यादा फँसी हुई थी, इसलिए बहुत कोशिश करने के बावजूद वह उसे निकाल नहीं पा रहा था। उसे छीनी निकालने के लिए इतनी मेहतन करते देख, बाकी बंदर भी उसका साथ देने लगे।
आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाई और छीनी, लकड़ी से बाहर निकल गई, लेकिन जैसे ही छीनी बाहर निकली, उस शरारती बंदर की पूँछ उसी लकड़ी में फंस कर कट गई।
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इस छोटी सी लघुकथा का Moral ये है कि किसी दूसरे के काम में तब तक हस्‍तक्षेप नहीं करना चाहिए, जब‍ तक कि वह काम स्‍वयं को भी ठीक से न आता हो।
यदि बन्‍दरों ने बढईयों को देखा होता है कि वे किस तरह से छीनी-हथौड़ी का प्रयोग करते हुए लकडि़याँ काट रहे हैं, तो निश्चित ही उन्‍हें पता होता कि जब छीनी, लकड़ी के अन्‍दर फँस जाती है, तब उसे कैसे निकाला जाता है। उस स्थिति में वे भी उसी तरह से छीनी काे निकालने की कोशिश करते और लकड़ी में फँसने की वजह से उस शरारती बन्‍दर की पूंछ नहीं कटती।
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